नववर्षाचे संकल्प

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चला  चला  नवीन  वर्ष  आले,  नवीन  संकल्प  करायची  वेळ  झाली.’  रोहन  मोठया  आनंदाने  गुणगुणत  होता.  श्वेताला  हसायलाच  आले,  टीवी  वरची  मोती  साबणाची  जाहिरात  पाहतोय  वाटले  तिला.  काय  फरक  आहे  येणारे  वर्ष  आणि  गेलेले.  सगळे  दिवस  सारखेच  असा  विचार  करत  आपला  लॅपटाॅप  बंद  करत  तिने  घड्याळाकडे  पाहिले.  बापरे!  दोन  वाजले,  सकाळी  आॅफिसला  जायचे  आहे  असा  मनाशी  बोलतच  ती  पलंगावर  आडवी  झाली  आणि  क्षणात  झोपुनही  गेली,  रोहन  तर  कधीचाच  झोपला  होता.

जाग  आली  तेव्हा  सकाळचे  साडेसात  वाजले  होते.  रोहन  आधीच  उठला  होता.   खूप  उशीर  झाला  होता  आणि  काम  वाट  बघत  होतं.   का  नाही  उठवलस  रे  मला,  बघ  किती  उशीर  झालाय.”   तू  रात्री  लेट  झोपलीस  ना  म्हणून  म्हटलंअसू  दे.”  अरे  पण…” त्याचा  चेहरा  पाहून  आणि  आज  नवीन  वर्ष  आहे  हे  लक्षात  येवून  ती  गप्प  झाली.  तेवढ्यात  डोक्यात  वीज  चमकली.  ऐक  ना  तू  नववर्षाचे  संकल्प  करतोयस  ना  त्यात  बायकोला  थोडी  मदत  करणे  हा  संकल्प  बसेल  का  रे?”  आॅफकोर्स  डार्लिंग  का नाही बसणार,  हम  तो  तैयार  ही  बैठें  हैं  मदत  करने  बस  आप  मना  करते  हों।  एकदम  रोमॅंटिक  अंदाजात  तो  बोलला  आणि  श्वेताला  हसूच  आले.  हसतच  ती  त्याला  बोलली, “चल  मग  मी  अंघोळ  करून  येईपर्यंत  सलाडच्या  भाज्या  कापून  ठेव  मी  आल्यावर  पटकन  सॅंडविच  बनवते.”  थोड्यावेळाने  बाहेर  येवून  पाहते  तर  काय!  मस्त  चहाचा  सुगंध  सुटलाय,  ब्रेडचे  कडा  कापून,  सँडविचसाठी  भाज्या  कापून  तयार  आहेत.  उशिरा  उठूनही  चांगला  हेल्दी  नाश्ता  करुन  दोघे  अगदी  वेळेवर  आॅफिसला  पोहोचले.  रोहनबरोबर  श्वेताने  पण  पहिला  संकल्प  केला– ‘शक्य  असेल  तेव्हा  एकमेकांची  कामात  मदत  घ्यायची’…

दिवसभर  काम  करून  संध्याकाळी  घरी  जायच्यावेळी  रोहनने  श्वेताला  काॅल  केला,  मी  घरी  चाललोय  काही  आणायचे  आहे  का?’  कामाच्या  घाईत  ती  बोलली,  मला  काही  आठवत  नाही  आता  नंतर  पाहू’.  रात्री  नेहमीप्रमाणे  उशीर  झाला  होता,  ती  आली  तेव्हा  बाहेरून  जेवण  मागवून  ठेवलं  होत  त्याने.  जेवण  करुन  आवराआवर  करून  ती  जेव्हा  बेडरूममध्ये  आली  तेव्हा  तो  म्हणाला,  श्वेता  काही  काम  आहे  का  आता  आॅफिसचे?”  आज  नाही  काही  हे  ऐकून  तो  बोलला,  आपण  अस  करूया  का,  रोज  लवकर  मीन्स  अकरा  वाजता  झोपूया  आणि  सकाळी  सहा  वाजता  उठूया,  झोपही  पुर्ण  होईल  आणि  लवकर  उठल्याने  काम  पणपुर्ण  होईल, मी  करेन  तुला  शक्य  तेवढी  मदत  पण  काय  करू  ते  तू  सांग.’  पण  माझे  प्रोजेक्ट  इनकम्पलिट  राहतात  रे  मग  जागरण  कराव  लागत.’  आज  कसा  पुर्ण  झाला  मग  प्रोजेक्ट?’  आज  निशा  आली  नव्हती  तर….’  बोलता  बोलता  थांबली  ती.  तिला  लक्षात  आले  का  काम  घरी  येते  ते.  चला  दुसरा  संकल्प– ‘उगीच  कामाचा  वेळ  फालतू  गप्पांमध्ये  वाया  घालवायचा  नाही.’

आठवडा  एकदम  सुरळीत  गेला.  खूप  शांत  समाधानी  वाटत  होते  कारण  पेंडिंग  काम  नव्हते,  एकमेकांच्या  मदतीमुळे  घरही  स्वच्छ  नीटनेटके  होते.  शनिवार  रविवार  सुट्टी  होती.  अचानक  दुपारी  रोहन  बोलला, “यार  श्वेता  बोर होतय  गं,  काहीच  नाही  करायला.”  काही    बोलता  श्वेता  उठली  आणि  आपल्या  पर्समधून  एक  पुस्तक  घेवून  आली.  पुस्तक  पाहून  झालेला  रोहनचा  आनंदी  चेहरा  पाहून  म्हणाली,  आपण  इतकं  उरीपोटी  धावतो  आठवड्याचे  पाच  दिवस  मग  एक  दिवसतरी  स्वतःला  नको  का  द्यायला?  आतापासुन  शनिवार  हा  स्वतःचे  छंद  जपण्यासाठी,  स्वतःचे  लाड  पुरवायला  वापरायचा”… तिसरा  संकल्प  हा  – ‘एक  दिवसतरी  स्वतःला  वेळ  द्यायचा.’

२६  जानेवारीच्या  कार्यक्रमची  रूपरेखा  ठरवण्यासाठी  सोसायटीची  मिटींग  बोलावली  होती.  रोहन  आणि  श्वेता  गेले  त्यासाठी.  तिकडे  गेल्यावर  पाहिले  की  सगळ्यांनाच  काही  ना  काही  बोलायचे  होते  पण  दुसऱ्यांचं  ऐकून  घ्यायला  कोणाला  वेळ  नव्हता.  म्हणजे  आपलं  म्हणणं  ऐकून  घ्यावं  म्हणून  सगळे  धडपड  करत  होते.  ते  बघून  यांनी  संकल्प  केला  कधी  कधी  समोरच्याचं  पण  ऐकून  घ्यावे,  मध्ये  काही    बोलता  कारण  काही  वेळेस  लोकांना  फक्त  एका  श्रोत्याची  गरज  असते,  मानसिक  गरज  म्हणा  हवे  तर.’

सकाळी  पेपर  वाचत  असताना  एका  बातमीने  श्वेताचे  लक्ष  वेधून  घेतले,  नवऱ्याच्या  अपघाती  निधनानंतर  बायकोला  त्याच्या  विम्याचे  वगैरे  एक  पैसाही    देता  सासरच्या  लोकांनी  घराबाहेर  काढले.  हे  वाचून  विचारात  पडलेल्या  श्वेताने  ठरवले  आपण  आर्थिक  बाबतीत  सुरक्षित  तर  आहोत  पण  आता  साक्षरही  व्हावे,  कारण  काळवेळ  सांगून  येत  नाही.

नवीन  वर्षाचे  संकल्प आणि  आपण  एका  ब्लाॅगर  सखीने  लिहलं  आहे  हे  नववर्षाचे  संकल्प  एक  अंधश्रद्धा  असते  आपण  तर  बुवा सहमत  आहोत  तिच्याशी.  संकल्प  हे  फक्त  करायचे  आणि  विसरून  जायचे  असतात  बाकी  ते  पाळणं  बिळणं  म्हणजे  झूठ  असतं  असं  समजणारी  मंडळी  ही  असतात  आणि  संकल्प  पार  पाडूनत्याचे  फोटो  अपलोड  करुन  दुसऱ्यांना  काॅम्प्लेक्स  देवून  छळणारी  लोकं  ही  असतात.  माझे  संकल्प  ही  काही  फार  मोठी  गोष्ट  नाही  कारण  मला  संकल्प  करायला  नवीन  वर्ष  लागत  नाही.  केव्हाही  खोकल्याची  उबळ  आल्यासारखी  मला  संकल्पाची  हुक्की  येते  मी  ते  पुर्ण  करायचे  प्रयत्न  करते,  काही  होतात  पुर्ण  तर  काही  नाही  लेकिन  चलता हैं!!!  पण  श्वेताच्या  संकल्पांमध्ये  माझे  अजुन  काही  संकल्प.

.बिल्डिंगमधल्या  काही  भावांना  हे  पटवून  देणे  की  मी  त्यांची  मानलेली  बहिण  आहे  तर  कृपया  विनाकारण  इंप्रेशन  मारायचा  प्रयत्न  करू  नये.

.ज्या  गोष्टी  आपल्या  हातात  नसतात  त्यांचा  जास्त  विचार  करायचा  नाहीं.  Peace  of  mind…

.कधी  कधी  आपण  नातं  संभाळण्यासाठी  आपली  चुक  नसली  तरी  पडते  घेतो  पण  हे  जर  नेहमीच  होत  असेल  तर  then  it  is  the  time  to  think  about  it.

.क्षुल्लक  गोष्टी  आणि  कारणांसाठी  आपल्या  तत्वांशी  तडजोड  करायची  नाही  पण  त्यामुळे  जर  कोणाचे  खरच  कल्याण  होणार  असेल  तर  मागे  हटायचे  नाही.

.मान  द्यावा  आणि  घ्यावा  लागतो  म्हणून  प्रत्येकाला  अगदी  साधे  काम  करणारे  वाॅचमन,  माळी  यांना  ही  आदराने,  माणुसकीने  वागवायचे  आणि  इतरांनाही  तसे  करण्यास  प्रेरित  करायचे.

बाकी  व्यायाम  करणे,  वाचन  करणे,  खाण्यापिण्यावर  लक्ष  देणे  हे  तर  आहेतच  पण  वर  सांगितलेले  संकल्पपण  महत्वाचे  आहेत  नाही  का?

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