मुलींनी खेळावी भातुकली.

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आज  मुलाचा  डांस  क्लास  सकाळी  दहा  वाजता  होता.  त्याला  परत  आणायला  मी  गेली  असता  मुलींचे  बोलणे  माझ्या  कानावर  आले,  बरं  झालं  ना  गं  सरांनी  आज  क्लास  दहा  ते  साडेअकरा  ठेवला  म्हणजे  आपल्याला  घरी  जावून  टीवी  पाहता  येईल.”

कृतिका,  एक  आॅलराउंडर  मुलगी,  म्हणाली,    आज  विमेन्स  डे  आहे  आणि  विमेन्स  20-20  वर्ल्डकपची  फायनल  पण.  आपल्या  इंडियाची  टीम  आहे  फायनलमध्ये आॅस्ट्रेलियाच्या  विरोधात  माहीत  आहे  ना.”

अरेच्चा,  हो,  विसरलीच  मी.  चला  पटापट  घरी  जावून  खावून  मॅच  बघायला  बसू.”  इति  मानसी

कुठली  मॅच    काय,  मला  तर  गेल्यागेल्या  मम्मी  अभ्यासाला  बसवेल.”  दिविशा  मान  हलवत  बोलली.

या  सगळ्या  मुली  आमच्या  बिल्डिंगमध्ये  राहतात  आणि  प्रत्येक  रविवारी  इतर  मुलांसोबत  क्रिकेट  खेळतात.  मी  त्यांना  येताजाता  क्रिकेट  खेळताना,  त्याबद्दल  चर्चा  करताना  पाहत  असते.  माझा  मुलगा  त्यांच्याच  वयाचा  आहे,  ते  सगळे  मित्र  आहेत.  मला  क्रिकेटबद्दल  असणारे  या  मुलींचे  वेड  माहीत  आहे  म्हणून  मी  पटकन  विचार  केला  आणि  त्यांना  म्हटलं,  पोरींनो  तुम्ही  आमच्या  घरी  येता  का  मॅच  पाहायला,  मी  तुमच्या  आयांना  तसा  मेसेज  करते.”  त्या  एकमेकींकडे  पाहायला  लागल्या.

काकू,  तुम्ही  म्हणताय  पण  मम्मी  म्हणेल  परीक्षा  आल्यात  अभ्यास  करा  मॅच  काय  बघताय.”  दिविशाने  उत्तर  दिले.

हो  काकू  असं  नेहमीच  म्हणतात  आमच्या  आया.”  मधुरा  बोलली.

मी  म्हटलं,  ठीक  आहे,  आपण  एक  काम  करू.  तुम्ही  आपल्या  अभ्यासाची  पुस्तकं  पण  घेवून  या.  साडेबारा  ते  तीन  मॅच  पाहू  आणि  तीन  ते  पाच  सिरियसली  अभ्यास  करायचा.”

वाव  काकू,  तुम्ही  जिनियस  आहात.  तुमच्या  घरी अभ्यासाला  कधीच  आई  नाही  म्हणनार.  आम्ही  आलोच  पंधरा  मिनिटात.”  हसत  मानसी  बोलली  आणि  सगळ्या  चिमण्या  आपापल्या  घरी  पळाल्या.

पंधरा  मिनिटात  मुली  आमच्या  घरी  आल्या.  अजून  मॅच  सुरू  व्हायला  अर्धा  तास  होता.  सगळ्या  मस्त  आरामात  बसल्या  होत्या.   टाॅस  जेव्हा  आॅस्ट्रेलियाने  जिंकला  आणि  ओह  नो!!!

काय  झाले?”

अरे  आपल्याकडे  फक्त  स्पिनर्स  आहेत,  फास्ट  बाॅलर्स  नाहीत.  आपली  जर  बॅटिंग  असती  तर  मोठा  स्कोर  होतो  आणि  समोरची  टीम  प्रेशर  खाली  येते.  पण  भारतीय  टीम  प्रेशरमध्ये  चांगली  नाही  खेळत.”

एखाद्या  मुरलेल्या  खेळाडूसारखी  टिप्पणी.  इतक्यात  गुलाबी  ड्रेसमध्ये  सुंदर  दिसणारी  केटी  पेरी,  अमेरिकन  गायिका  मैदानावर  आली.  तिने  गायला  सुरू  केली.  शब्द  कोणालाच  समजत  नव्हते  पण  मुली  तिच्याकडे  पाहत  होत्या.  अय्या,  तिचे  कानातले  पाहिलेस,  प्लसचे  साईन  आहे  त्यावर.  आणि  ज्यावर  ती  उभी  आहे  त्या  स्टेजचा  आकार  पण  एक  वर्तुळ  आणि  त्याखाली  अधिक  चिन्ह  असेच  आहे.” लहानगी  दिविशा  बोलली.

अगं  वेडी  ते  वुमनहूडचे  सिंबोल  आहे.  सायन्समध्ये  फिमेल  म्हणजे  स्त्री  त्या  चिन्हाने  दाखवली  जाते.”  कृतिकाने  उत्तर  दिले.

पण  का  ते  चिन्ह?”

मला  माहीत  नाही  पण  मला  वाटते  निसर्गाने  स्त्रियांना  मानवी  वंश  वाढवायची  जी  क्षमता  दिली  आहे  त्यामुळे  असेल.” कृतिका  जी  आठवीत  आहे  तिचे  हे  बोलणे  ऐकून  मला  नवल  वाटले.  हा  असा  विचार  तर  मीसुद्धा  केला  नव्हता!

खेळाडू  मैदानात  यायला  सुरू  झाले  होते.  त्यांच्याकडे  पाहून  मानसी  बोलली, “किती  साध्या  दिसतात  ना  या,  थोड्या  काळ्या  पण  वाटतात  नाही?”

हो  मग  असं  ऊनात  खेळावं  लागत  ना  म्हणून.  मला  पण  मोठं  होवून  प्लेअर  बनायचे  आहे  पण  आजी  म्हणते  मुलींना  काय  करायचे  आहे  खेळून  त्यात  कसलेच  भविष्य  नाही,  उलट  बाहेर  खेळून  काळ्या  पडणार  मग  कोण  तुमच्याशी  लग्न  करेल?”

आणि  माझी  मम्मी  म्हणते  हात  पाय  मोडुन  घेवून  अधू  झालीस  म्हणजे  कसं  होईल  तुझे.”

यार  या  पोरांचे  एक  बरे  आहे,  ते  कितीही,  कुठेही  खेळू  शकतात  पण  आम्ही  चार  भिंतीत  राहायचे,  फक्त  मुलींचे  खेळ  खेळायचे.  तुम्हाला  सांगते  माझी  एक  मैत्रिण  आहे  तिला  गीता  बबिता  सारखं  रेसलर  व्हायचे  आहे.  तिने  हे  तिच्या  पप्पांना  फक्त  सांगितले  तर  त्यांनी  तिला  खूप  मारलं.”  मधुराचे  हे  ऐकून  पोरी  सुन्न  झाल्या.

काय  करणार  गं  तसं  पण  कोणतेही  खेळ  खेळून?  कारण  इथे  सगळं  ग्लॅमरतर  फक्त  क्रिकेटला  मिळते.  आता  विमेन्स  क्रिकेटचेच  उदाहरण  घेवू,  जेंट्स  क्रिकेटरची  नावें  तर  सर्वांनाच  माहीत  असतात  पण  किती  लेडिज  क्रिकेटरची  नाव  लोकांना  माहीत  आहेत?  आज  टीम  वर्ल्डकप  फायनलपर्यंत  पोहोचली  म्हणून  फेसबुक,  ट्विटरवरून  सगळ्यांनी  शुभेच्छा  दिल्या  पण  या  संघाला  पुरूषसंघासारख्या  सोईसुविधा,  संधी,  प्रॅक्टीस  मिळाली  का?  मोठे  मोठे  पुरुष  क्रिकेटर  आम्हाला  तुमचा  अभिमान  वाटतो  म्हणून  ट्वीट  करतात  त्यापेक्षा  क्रिकेटर  बनू  इच्छिणाऱ्या  मुलींना  आपल्या  ज्ञानाचा  फायदा  देत  प्रशिक्षण  का  नाही  देत?”

हे  बघा  मुलींनो,  तुम्ही  म्हणताय  ते  खरंच  आहे  पण  हे  सगळं  एका  दिवसात  तर  बदलणार  नाही  पण  म्हणून  तुम्ही  खेळणं  बंद  करणार  का?  यातून  तुम्हाला  किती  आनंद  मिळतो  मग  कुणी  आपल्याला  प्रोत्साहन  देत  नाही  म्हणून  आपण  आपला  आनंद  विसरून  जायचा  का?”  मुली  विचारात  पडल्या.

दंगल  सारखे  चित्रपट  पाहून  आपल्याला  मुलींच्या  कुस्तीबद्दल  माहीत  झाले.  नाहीतर  वर्षानुवर्षे  फक्त  बॅडमिंटन,  टेबलटेनिस,  बुद्धीबळ,  शुटिंग  इतकेच  खेळणाऱ्या  मुली  आपल्याला  माहीत  आहेत.  मेरीकोम,  पी.टी.  उषा,  अंजली  भागवत,  मिथाली  राज  यासारख्या  कितीतरी  स्त्रिया  क्रिडाक्षेत्रात  नावाजलेल्या  असून  ही  आपण  मुलींच्या  खेळाला  कधीच  प्रोत्साहन  दिले  नाही.  मुलगा  बाहेर  खेळतोय  किंवा  मैदान  गाजवतोय  तर  किती  अभिमान  वाटतो  पालकांना  पण  मुलगी  कितीही  चांगले  खेळत  असली  तरी  खेळ  हे  मुलींचे  क्षेत्र  नाही,  बाहेर  खेळून  काळी  पडशील  मग  कोण  तुझ्यासोबत  लग्न  करणार,  कितीही  चांगलं  खेळत  असलीस  तरी  शेवटी  करायचा  आहे  तो  स्वयंपाकच  अशी  अनेक  कारणं  सांगून  आपण  मुलींना  घरी  बसवतो.

आपला  हक्क  मिळवण्यासाठी  मुलींना  इथेही  झगडावे  लागते.  पुरुष  खेळाडूंसाठी  सगळे  मानसम्मान  हात  जोडुन  उभे  असतात  आणि  महिला  खेळाडू  आपल्याला  निदान  मूलभूत  सोईसुविधा  तरी  मिळाव्यात  म्हणून  सिस्टीमशी  दोन  हात  करत  असतात.  बरोबर  आहे  ना  जर  घरातूनच  आमच्या  मुलींच्या  पाठीवर  आधाराचा  हात  नसेल  तर  बाहेर  कोण  त्यांना  पाठिंबा  देईल!!!

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