राजकारण हे स्त्रियांचे क्षेत्र नाही

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उषा  जरा  पटकन  या  कागदावर  सही  करून  दे  पाहू.”  गणेशअण्णा  वहिनीला  म्हणाला.  काय  आहे  ते?”  आपले  पिठाने  माखलेले  हात  धुवत  वहिनीने  विचारले.

ते  गावच्या  रस्त्याचे  टेंडर  काढले  होते  ना, रामाला  त्याची  आॅर्डर  द्यायची  आहे,  ते  कागद  आहेत  हे.”

पण  मी  काय  म्हणते  हे  काम  रामाभावोजींना  नको  दयायला  आपण,  मागच्यावेळी  किती  खराब  काम  केले  होते, एका  पावसात  रस्त्याची  चाळणी  झाली.  सुलेखावहिनीला  सातपदरी  चपलाहार  तेवढा  झाला.”

तू  सही  तेवढी  कर,  तुला  पण  सोन्याने  मढ़वेन  मी.  तो  रामा  आपला  माणूस  आहे.  आणि  तुला  काय  कळतं  या  राजकारणातलं.”

काही    बोलता  वहिनीने  अण्णाला  सही  करून  कागद  दिला.  उषावहिनी  गावची  सरपंच  होती.  फक्त  नावालाच  ती  सरपंच  होती  बाकी  सारा  कारभार  तर  अण्णाच  पाहायचा.  वहिनी  फक्त  सांगेल  तिथे  सह्या  करायला.  तालुक्याला  मीटिंग  असली  की  वहिनीसोबत  अण्णा  जाणार,  अधिकाऱ्यांना  दाब  देवून  बोलणार,  सरपंचाचा  नवरा  म्हणून  मिरवणार.  आणि  काही  पटलं  नाही  म्हटलं  की,  तुम्हाला  बायकांना  काय  कळतं  राजकारणातलं  हे  वाक्य  ऐकवणार. शिकलेल्या  वहिनीला  हे  पटत  नव्हते  पण  करणार  काय.  लहानपणापासूनच  ती  राजकारण  बायकांचे  काम  नव्हे  हे  ऐकतच  मोठी  झाली  होती.  वहिनीचे  सासर  आणि  माहेर  दोन्ही  राजकारणातील  नावाजलेली  बडी  घराणी.  अशा  लोकांमध्ये  लग्नासारखी  नातीही  राजकारणातील  समीकरणं  डोळ्यांसमोर  ठेवून  जोडली  जातात.  मग  मुलामुलीची  पसंती  वगैरे  दुय्यम  ठरत  त्यासमोर.  आताही  फक्त  नाईलाज  म्हणून  अण्णाने  वहिनीला  सरपंच  बनवले  होते  कारण  यावर्षी  सरपंचाची  जागा  महिला  राखीव  झाली  होती.  वर्षानुवर्षे  त्या  कुटुंबाने  सरपंचपद  स्वतःकडे  राखून  ठेवले  होते  आता  ते  हातचे  थोडीच  जावू  देणार  होते.

रस्ता  झाला.  रामाची  बायको  सुलेखाजडशीळ  पाटल्या  घालून  मिरवु  लागली.  उषावहिनीला  आपल्या  सहीने  होत  असलेला  भ्रष्टाचार  पाहावत  नव्हता  पण  नवऱ्याच्या  विरोधात  जाण्याचे  धाडस  नव्हते.  उषा,  दहा  कप  चहा  पाठव  बैठकीत,  कार्यकर्ते  आलेत.”   

हो,  आणते.”  वहिनी  चहा  घेवून  गेली.  पुर्ण  बैठकीत  दारूचा  दरवळ  सुटला  होता.  तिच्या  अंगाला  काटा  आला.  सगळी  वीस  बावीस  वर्षाची  पोरं.

अहो,  ती  सगळी  पोरं  एवढ्या  लहान  वयात  दारू  पिवून…”

सरपंचीनबाई,  अहो  त्यात  नवल  काय,  गेल्या  महिन्यात  तुम्हीच  त्या  लायसेंसच्या  अर्जावर  ना  हरकत  ची  सही  केली  होती.”  अण्णा  हसत  बोलला.

वहिनीच्या  अंगावर  वीज  पडली.  ती  चांगली  शिकलेली  होती.  समजुतदार  होती.  तिच्या  अंगात  पिढ्यांपिढ्याचे  राजकारणी  रक्त  खेळत  होते  म्हणून  भविष्याचा  अंदाज  यायला  तिला  वेळ  लागला  नाही.  अजून  पाच  वर्षाने  त्या  मुलांच्या  जागी  आपला  मुलगा  असू  शकतो  या  विचाराने  तिचा  थरकाप  उडाला.  दारूमुळे  उधवस्त  झालेले  गावातील  कित्येक  संसार  तिला  आठवले.  आता  तिने  आपल्या  पदाचा  खरा  उपयोग  करायचा  ठरवले.   लागोलाग  तिने  बायकांची  मीटिंग  बोलावली.  त्यांना  आपला  दारूबंदीचा  आपला  मानस  बोलून  दाखवला.  बायकांना  पटवुन  देण्याचा  प्रश्नच  नव्हता.  दारूड्या  नवऱ्यांमुळे  त्यांचे  आयुष्य  मातीमोल  झालेच  होते.  आपल्या  मुलांच्या  भविष्यासाठी  त्याठामपणे  उषावहिनीच्या  मागे  उभ्या  राहिल्या.

आपल्या  पदाचा  वापर  करत  वहिनी  दारूबंदीसाठी  धडपड  करू  लागल्या.  खूप  म्हणजे  खूप  अवघड  काम  होते  ते.  घरी  दारी  सगळीकडून  विरोध.  (ते  सगळं  लिहायला  बसली  तर  अजून  दोन  लेख  होतील)  प्रसंगी  बायकांना  मारहाण  सोसावी  लागली.  पण  या  सावित्रीच्या  लेकी  मागे  हटल्या  नाहीत.  तीन  वर्षाच्या  अथक  लढ्याला  यश  आले  आणि  गावात  १००%  दारूबंदी  झाली.  नंतरच्या  निवडणुकीत  वहिनी  पुरुष  उमेदवाराला  हरवुन  निवडून  आली.

आता  वहिनी  फक्त  सहयांसाठी  ग्रामपंचायतेत  जात  नाही  तर  सरपंच  म्हणून  असणारी  आपली  कर्तव्य  पार  पाडायला  जाते.  आधी  जीव  तोडून  विरोध  करणारा  अण्णा  आता  मनापासून  आदर्श  गाव  बनवण्यासाठी  मदत  करतो  आणि  बायकांना  काय  कळतं  राजकारणातले  हे  वाक्य  तर  तो  विसरूनच  गेलाय.

ही  कथा  सत्यघटनेवर  प्रेरित  आहे.  माझ्या  माहेरी  जवळजवळ  प्रत्येक  घरात  राजकारणी  आहेत.  माझे  आजोबा,  काका,  मामा,  मामी,  आत्या,  वहिनी  प्रत्येक  स्त्री  पुरुषाने  कमीतकमी  एकतरी  पद  भूषवले  आहे.  माझे  एक  आजोबा  काही  वर्षापुर्वी  केंद्रीय  गृहमंत्री  होते.  पण  स्त्रिया  मात्र  या  कथेत  सांगितल्याप्रमाणे  फक्त  नामधारी  होत्या  आणि  आहेत.  आम्हा  बायकांचे  काम  फक्त  बैठकीत  कार्यकर्त्यांसाठी  चहा  पाठवणे  आणि  निवडणुका  आल्या  की  डोक्यावर  पदर  घेवून  हात  जोडून  फोटोसाठी  पोज  देणे  किंवा  मत  मागणे.  पिढ्यानपिढ्या  समाजकारणात  असल्याने  कोणीच  कुठे  हरले  नाही  पण  आमच्यापैकी  कोणी  या  क्षेत्रात  यायचे  म्हटले  की  ही  अनुभवी  मंडळी  विरोध  करतात.  त्यांच्यामते  राजकारण  आधीसारखे  राहिले  नाही.  येथे  आता  तत्वाचे  राजकारण  होत  नाही.  बायकांच्या  तर  चारित्र्यावर  शिंतोडे  उडवण्यापर्यंत  मजल  जाते.  या  अशा  वृत्तीमुळे  नगराध्यक्ष  असलेल्या  माझ्या  आत्याला  कोणकोणत्या  प्रसंगाना  तोंड  दयावे  लागले  ते  आठवून  मन  निराश  होते.

समानता  हा  हक्क  असला  तरी  राजकारणात  हा  हक्क  पुरुष  कधीच  मान्यकरत  नाहीत.  हेच  कारण  आहे  सामान्य  घरातील  मुली  राजकारणाचा  करियर  म्हणून  विचार  करत  नाहीत.  जगातील  सगळ्यात  मोठी  लोकशाही  असलेल्या  भारतात  फक्त  अंदाजे  ११%  स्त्रिया  लोकसभा  आणि  राज्यसभेत  प्रतिनिधी  आहेत.  कारण  लहानपणापासून  हेच  ऐकत  आणि  पाहत  आम्ही  मोठे  झालोय  राजकारण  हे  स्त्रियांचे  क्षेत्र  नाही.’

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