सुकून… ०.०० कि.मी.

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हम जिसकी तलाश में…
दरबदर भटकते रहे,
वो था हमारे अंदर ही…
न जाने क्यूँ उससे भागते रहे।।1||

वो था हर दम हमारे पास….
पर हम उसे ही दुतकारते रहे,
कुछ नये तो कभी पुराने पन्ने…
यूँ ही हर वक़्त पलटाते रहे।।२।।

कभी धुल खाते सामानो को…
एक टक न्याहारते रहे,
तो कधी नए सामानो की धुल…
न जाने बेवजह पोछते रहे।।३।।

सब तो था हमारे पास…
फिर किसे हर वक़्त…
हम खोजते रहे…

कभी आधा भरा जाम…
तो कभी पुरा,
बेवजह हम छलकाते रहे….
फिर भी वो नही मिला आसपास,
जिसे हम हर वक़्त तलाशते रहे।।4।।

हर तरह के ऐशओआराम….
हर मज़ा हम लुट लिए,
उस मुकाम पर पोहोच गए…
जहाँ हर किसीका जाना मुश्किल हैं,
फिर भी नही मिला वो,
उसकी तलाश अभी भी जारी हैं।।5।।

फिर एक दिन नजर पडी उन तस्वीरों पर….
जो टांगी थी सालो पेहले हमने ही दिवाँरो पर,
जमीं थी मोटी धुल इसलिए देख ना पाएँ…
जो था सामने ही पर ढूंढ़ते रहे जिंदगी भर।।6।।

वो था…

वो था हमारा पाक बचपन….
वो मुस्कुराता चेहरा,
वो ख़ुशहाल जीवन….
वो कही रूठने का मज़ा,
तो कही मनाने की शिकन….
वो दोस्तों की मेहफ़ीले जिसमें डुबा हर गम,
वो लेहराते खेत….
वो खिलखिलाता मौसम,
कुछ भी तो नहीं रहा अब,
वक़्त के साथ खो ही दिया यौवन
ये उन दिनो की बात है…
जब वो मिलता था हर आँगन।।7।।

फिर निकल पड़े उसकी तलाश में…
जो समाया था हमारे ही अंदर,
उसका नाम था “सुकून”….
जो रहता था बचपन के आशियानो में,
जिसे हम तलाश रहे थे बुढ़ापे की गलियारो में।।8।।

चुपके से केह रहा था हमें….
जरा देखो ख़ुद ही को,
हम मिल ही जाएँगे…
आपको आपके ही आइने में।।9।।

वो था….

वो था हमारे ही भीतर….
जिसे ता उम्र हम खोज रहे थे इधर उधर…
इधर उधर…..
वो आख़िर मिल ही गया खुद ही के भीतर।।

शुक्रिया…
©️®️अश्विनी दुरगकर.

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मनोरंजन

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