स्वप्नांच्या मागे धावताना…

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श्लोक  चल  लवकर,  उशीर  होतोय  मला.” सातव्या  मजल्यावर  राहणाऱ्या  हर्षालीचा आवाज  अख्ख्या  बिल्डिंगमध्ये  घुमला.  सकाळचे  फक्त  सहाच  वाजले  होते  हर्षाली  बारा  वर्षाच्या  श्लोकला  क्रिकेटच्या  कोचिंगसाठी  घेवून  जात  होती.  त्याला  ग्राउंडवर  सोडून  येवून  तिला  नवऱ्यासाठी  डबा,  नाश्ता  बनवायचा  होता.  आठ  वाजता  शमिकाला,  तिच्या  पाच  वर्षाच्या  मुलीला,  शाळेत  सोडायचे  होते.  मग  तिथुन  श्लोकला  आणायचे  आणि  दहा  वाजेपर्यंत  त्याची  तयारी  करून  स्कूलबसमध्ये  बसवून  द्यायचे.  उफ्फ  किती  काम  ते!  सांगता  सांगता  मलाच  थकवा  आला.

हर्षाली  आजच्या  पिढीची  शिकलीसवरलेली  सुपर  वुमन.  हो  सुपर  वुमनच.  तिला  आपल्या  मुलाला,  मुलीला  आणि  स्वतःला  सगळं  अक्षरश:  सगळं  यावं  असं  वाटतं.  दिवसभर  घाण्याच्या  बैलासारखी  स्वतः  राबत  असते  आणि  बिचाऱ्या  मुलांना  पण  राबवत  असते.  आपल्याला  खूप  काही  यावं  असे  वाटण्यात  काही  गैर  नाही  पण  हे  खूप  म्हणजे  किती  हे  जेव्हा  तुम्ही  ठरवू  शकत  नाही  तेव्हा  मात्र  गडबड  होते.  हर्षालीच्या  श्लोकचे  उदाहरण  घ्या.  रोज  सकाळी  क्रिकेट  कोचिंग  मग  शाळा.  तिथुन  आल्यावर  जेवण  करून  शाळेच्या  अभ्यासासाठी  ट्यूशन  मग  दोन  तासाने  रिलॅक्स🤔  होण्यासाठी  आठवडयातून  तीन  दिवस  गिटार  क्लास  (छंद  हवे  हो  माणसाला  रिलॅक्स  होण्यासाठी  इति  हर्षाली)  आणि  तीन  दिवस  चित्रकला  वर्ग  (ड्राॅईंगचे  एक्स्ट्रा  मार्क  मिळतात  दहावीला  आणि  पुढे  डाॅक्टर,  इंजिनिअर  झाला  तर  त्यालाच  फ़ायदा  त्या  क्लासचा  हर्षाली  उवाच).  हुश्य  किती  ही  पळापळ.  हे  सगळे  क्लास  आटोपुन  मुलगा  जेव्हा  घरी  येतो  तेव्हा  त्याच्यात  चालायचे  सुद्धा  त्राण  राहत  नाही.

मुलगा  तर  मुलगा  ती  बिचारी  पाच  वर्षाची  शमिका  आताच  डान्स  क्लास,  सिंगिंग,  बॅडमिंटनच्या  क्लासला  जाते.  उन्हाळयात  दोन्ही  मुलं  पोहण्याच्या  क्लासला  आणि  बालनाट्य  शिबिराला  जातात.  स्वतः  हर्षाली  झुंबा,  योगा  आणि  पाककलेच्या  वर्गाला  जाते.  माझ्यावर  विश्वास  ठेवा  मी  जे  सांगतेय  ते  सगळं  खरं  आहे  अगदी  १००% .  या  सर्वोत्तम  बनण्याच्या  अट्टहासातून  फक्त  हर्षालीचा  नवरा  सुधीर  सुटला  कारण  तो  या  सगळ्याला  लागणारा  पैसाकमावण्याच्या  मागे  पळतोय.

काय  चाललंय  नक्की,  कशासाठी  हा  सगळा  खटाटोप.  मान्य  आहे  आपली  काही  स्वप्न  असतात,  इच्छा  आकांक्षा  असतात  पण  त्यामागे  असे  उर  फूटेस्तोवर  धावणं  कितपत  योग्य  आहे?  या  कामाच्या  धबडग्यातून  कधी  कधी  आईला  पोटभर  जेवायलापण  वेळ  मिळत  नाही.  मग  तब्बेतीच्या  तक्रारी  सुरू.  या  पळापळीचा  हर्षालीवर  इतका  विपरीत  परिणाम  झालाय  ती  साधं  शांतपणे  बोलणं  जणु  विसरूनच  गेलीय.  जेव्हा  पाहावं  तेव्हा  ओरडुन  बोलत  असते.  चिडचिड  करते.  मनावर,  शरीरावर  येणारा  ताण  ती  याप्रकारे  व्यक्त  करते.  त्यामुळे  अख्या  बिल्डिंगमध्ये  चेष्टेचा  विषय  झाली  आहे  ती.  अगदी  लहान  मुलंसुद्धा  तिला  आरडाओरडा  आंटी  म्हणून  ओळखतात.

हर्षालीला  जेव्हा  सांगायचा  प्रयत्न  केला  की  बाई  प्रत्येकाला  प्रत्येक  गोष्ट  येत  नसते  तर  तू  का  आम्हाला  सगळं  यावं  हा  अट्टहास  करतेस,  का  स्वतःला  आणि  मुलांना  इतकं  प्रेशराईज  करतेस  तर  म्हणाली,  आत्ताचे  जग  हे  स्पर्धेचे  जग  आहे.  इथे  राहायचे  असेल  तर  तुम्ही  बेस्ट  असलेच  पाहिजे.  माझी,  माझ्या  मुलांची  काही  स्वप्नं  आहेत.   आता  ती  स्वप्नं  पुर्ण  करायची  तर  एवढी  मेहनत  तर  केलीच  पाहिजे  ना.  स्वप्न  पुर्ण  करण्यासाठीच  तर  आपण  जगतो  किंवा  जगले  पाहिजे.  नाहितर  आयुष्य  तर  किडयामुंग्याना  पण  मिळतं  ना?”

स्वप्नं  आहेत  म्हणून  आपण  आहोत  हे  कितीही  खरं  असले  तरी  अनिश्चित  भविष्यासाठी  जीव  तोडून  धावताना  हातातला  सुंदर  आज  निसटुन  जातोय  हे  नसेल  का  कळत  यांना  खाली  गार्डनमध्ये  खेळणाऱ्या  मुलांकडे  असूयेने  पाहणाऱ्या  श्लोक  शमिकाकडे  पाहिलं  तर  काहीतरी  चुकत  असल्यासारखं  वाटतं  पण  लक्षात  घेतो  कोण!   

Work  hard  for  better  tomorrow  but  take  a  moment  to  appreciate  best  today,  while  living  for  tomorrow  make  sure  you  don’t  forget  to  live  today…

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सामाजिक

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