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फिर आएगी बहार 03

शांति के जीवन में क्या फिर आएगी बहार
भाग 03


आसमान में काले बादल घिर आए और जोरदार बिजली कड़कने लगी।रिमझिम बारिश की फुहार ने शांति को पूरी तरह भीगो दिया।अतीत की यादों ने उसे जकड़ लिया और वह स्थिर हो गई।

शादी के बाद की वह पहली रात। आकाश में चाँदनी बिछी हुई और मध्यम हवाएँ चल रहीं थी।शांति ने लाल रंग की साड़ी में सुनहरे रंग का ब्लाउज पहना हुआ था। सोलह श्रृंगार के साथ उसने स्वयं को आईने में निहारा और बिस्तर पर बैठ गई। आँखों में इंतजार और मन में उठी बेचैनियों के साथ वह दरवाजे को निहारती रही। लगभग एक घण्टे के बाद उसे आयुष के कदमों की आहट सुनाई पड़ी।

“तुम यहाँ मेरे कमरे में! ये सब क्या है शांति"
आयुष ने अंदर प्रवेश किया।

“मैं आपका ही इंतजार कर रही थी। आइए न”
शांति ने धीमे स्वर में कहा।
“तुम मेरा इंतजार क्यों कर रही हो! वैसे तुमने खाना खा लिया होगा न! तो अब सो जाओ”
“देखिए, मैं आपसे कुछ”
“देखो शान्ति! हमारी शादी जिस कंडीशन में हुई है उसे देखकर भी अगर तुम इस तरह सपने सजाती हो, तो वो तुम्हारी गलती है”
“पर इसमें मेरा क्या कसूर! मैंने तो दिल से आपको अपना पति माना है”
“शांति प्लीज! मैं अभी इन सब के बारे में नहीं सोच सकता। अच्छा यही होगा कि तुम भी.. खैर मुझे नींद आ रही है गुड नाइट”
आयुष ने अपना बिस्तर नीचे लगाया और चादर तानकर सो गया।
शांति का सोलह श्रृंगार अब धरा रह गया। उसके चेहरे की रौनक खत्म सी हो गई और आँखों का काजल बूंदों में छुप गया।मन में जगी उमंगों ने दम तोड़ दिया और वह आयुष को दूर से ही निहारती रही।


बादलों की गड़गड़ाहट ने उसका ध्यान भंग किया और वह अतीत से बाहर आई।मन में तरह-तरह के विचार आने लगे। विवाह के इतने वर्षों बाद भी उसके जीवन का ये पतझड़ कब खत्म होगा। क्या जीवन भर वह सच्चे प्यार के लिए तरसती रहेगी। दुनिया को दिखाने के लिए आयुष ने उसे संतान का सुख तो दे दिया किंतु आज तक उसके स्पर्श में कोई प्रेम न था। उसने तो रिश्ते निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी सदैव ही आयुष का सम्मान किया। आज तक उससे कभी ऊँची आवाज में कभी बहस तक नहीं किया।जो भी मिला उसमें ही जीना सीख लिया था और कभी कोई चीज माँगी तक नहीं।
बारिश की इन बूँदों ने उसके आँसुओं को छुपा लिया और वो एकटक खुले आसमान को निहारती रही।वो गला फाड़कर रोना चाहती थी किंतु उसने अपने स्वर दबा लिए और मन ही मन घुटने लगी।मूसलाधार बारिश से पूरा आँगन जलमग्न हो गया किंतु शांति के पैर वहीं जमे रह गए।


सोफे पर लेटा हुआ आयुष एकटक निहार रहा था। उसके कानों को बार- बार एक ही आवाज सुनाई देता, “पाप मुझे क्रिकेट खेलना अच्छा नहीं लगता…
बिल्कुल भी पसंद नहीं मुझे क्रिकेट”
अब तक तो उसे यही लगा था कि निखिल धीरे-धीरे ही सही क्रिकेट में अपनी रूचि बना ही लेगा किंतु आज जिस प्रकार उसका रवैया नजर आया है।मानो उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया हो।उसके अपने बेटे ने ऐसा कहा। उसने झूठ का सहारा लेकर अपने पिता के अरमानों को चूर-चूर कर दिया। क्या एक बेटे से उम्मीद लगा लेना गलत है।
उसने अपनी पलकें झपकाईं और कुछ बूँदे उसकी आँखों से टपक पड़े।उसके मस्तिष्क को कुछ पुरानी यादों ने घेर लिया।


सागर के एक निजी अस्पताल में डॉक्टर मिश्रा की कैबिन के बाहर आयुष और शांति चिंतित खड़े हुए थे।जैसे ही डॉक्टर बाहर आए आयुष ने घबराते हुए कहा,”मेरा बेटा कैसा है डॉक्टर साहब! वो जल्दी ठीक तो हो जाएगा न”
“देखिए मिस्टर मित्तल, ऐसे केस में रिकवर होने में काफी टाइम लग जाता है। फिलहाल तो अभी वो खतरे बाहर है लेकिन अभी कुछ दिनों तक आपको उसका अच्छे से ख्याल रखना है”

“डॉक्टर साहब, मेरा बेटा जल्दी अपने घर आ जाएगा न”
शांति ने भी भावुक होते हुए कहा।

“हाँ-हाँ क्यों नहीं! उसे भी तो अपने मम्मी पापा की गोद में खेलना है”
डॉक्टर मिश्रा ने शांति को सांत्वना देते हुए कहा।

“सर और कितने दिन!मेरे लाडले को मैंने अभी तक अपनी गोद में अच्छे से उठाया भी नहीं है और ये सब”
आयुष ने दोनों हथेलियों को निहारते हुए कहा।

“बस!कुछ दिन और। प्लीज!आप हिम्मत रखिये”
डॉक्टर मिश्रा ने उसे समझाया और पेशेंट वार्ड की ओर चले गए।

कैबिन के बाहर प्रतीक्षालय में आयुष बैठ गया। उसके बाईं ओर खड़ी हुई शांति मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करती रही। इसी बीच आयुष ने अपनी जेब से फोन निकाला।रुआँसा होते हुए उसने फोन पर किसी व्यक्ति से कहा,”सर! ऐसा लगता है किस्मत कुछ और ही चाहती है। मेरा बेटा जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा है, मेरे लिए मेरे उससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। मैं उसे इस हाल में छोड़कर टूर्नामेंट के लिए नहीं जा सकता”

बादल जोरों से गरज रहे थे। आयुष का ध्यान अतीत की यादों से बाहर आया।वह करवट बदलता रहा किंतु उसकी बेचैनियों ने उसे सोने न दिया।

अगली सुबह
सागर के निजी विद्यालय ब्राईट फ्यूचर इंग्लिश मीडियम स्कूल में प्रार्थना सभा के बाद निखिल अपने मित्रों के साथ क्लास में जा रहा था। आसपास बच्चों की भीड़ बनी हुई थी और इसी बीच उसे किसी ने पुकारा।
“अरे!ये तो कोच सर है”
अपने क्रिकेट कोच मिस्टर वर्मा को देख निखिल बुदबुदाया।

“निखिल!बेटा कैसे हो”
मिस्टर वर्मा ने निखिल के सामने आकर कहा।
निखिल उनसे नजरें चुराने लगा और शांत ही खड़ा रहा।

“क्या हुआ निखिल! चुप क्यों हो”
मिस्टर वर्मा ने उसका हाथ थामकर कहा।
“सर वो मुझे क्लास के लिए लेट हो रहा है”
निखिल ने असहज महसूस करते हुए कहा।
मिस्टर वर्मा उसे थोड़ी दूर एकांत में ले गए और बड़े प्यार से कहा, “मैं तुम्हारी हालत समझ सकता हूँ बेटा, मैं ये तो नहीं जानता कि तुमने मुझे झूठ क्यों कहा। तुम्हारी अपनी लाइफ है अपने फैसले हैं”
“सॉरी सर! मैंने झूठ बोला उसके लिए”
“निखिल! शायद तुम नहीं जानते बेटा! तुम्हारे पापा ने बहुत कुछ सहा है और कितनी बार उन्होंने अपने सपनों को चूर-चूर होते हुए देखा है।मैं तुम्हे फोर्स नहीं करुँगा कि तुम बेमन से क्रिकेट खेलो लेकिन तुम अपने पापा से माफी जरूर माँग लेना उन्हें अच्छा लगेगा”
मिस्टर वर्मा ने निखिल को समझाया और ऑफिस की ओर चले गए।उनकी बातों ने निखिल के मन में उथल पुथल कर दिया। अब तक उसने अपने पिता का चिड़चिड़ापन देखा है। क्या इसका भी कोई कारण है, उनके क्रिकेटर बनने का सपना कैसे टूटा, क्या इसके पीछे कोई दर्द भरी कहानी है? इसी बीच उसके किसी सहपाठी ने उसे पुकारा और वे क्लास की ओर चले गए।


आई. सी.ई कम्प्यूटर सेंटर
सुबह के दस बज रहे थे।मीटिंग रूम में सभी महत्वपूर्ण कर्मचारी विराजमान थे। मिस्टर दुहलानी ने सभी का अभिवादन किया और कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
एक्सेल नेट कंप्यूटर एजुकेशन की टीम से पचास वर्षीय मिस्टर राधेश्याम गुप्ता ने सभी को संबोधित करते हुए कहा,”एक्सेल नेट कंप्यूटर एजुकेशन की पूरी टीम की ओर से आप सभी को नमस्कार। हमारी संस्था का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों को कौशल-आधारित शिक्षा प्रदान करना है ताकि वे अपने चुने हुए क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें। हमें तलाश है ऐसे इंस्टीट्यूट की जो हमारे इस उद्देश्य को पूरा करने में अपनी बराबरी का योगदान दें”
तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। मिस्टर दुहलानी ने कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए आयुष और समीर को प्रेजेंटेशन के लिए सामने बुलाया।