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फिर आएगी बहार भाग -08

निखिल की रुचि के लिए आयुष का नजरिया बदलता है।

भाग 08

सुबह के दस बज रहे थे। आई सी आई कम्प्यूटर सेंटर में लोगों की आवाजाही लगी हुई थी। मीटिंग हॉल में मिस्टर दुहलानी अपनी कुर्सी पर विराजमान थे। आयुष, समीर तथा अन्य कर्मचारी भी वहाँ मौजूद थे। मिस्टर दुहलानी ने सभी को संबोधित करते हुए बताया कि उनका सेंटर एक्सल नेट एजुकेशन के लिए चयनित हो गया और अगले सप्ताह से उनकी शिक्षण प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाएगी। उन्होंने आयुष को अपने स्थान पर खड़े होने का इशारा करते हुए कहा, “समीर का प्रेजेंटेशन तो आप सभी ने देखा ही था। कितने बेहतरीन तरीके से सबकुछ समझाया गया था। लेकिन उस दिन आप लोगों ने कुछ आधा अधूरा सा महसूस किया होगा न”
“जी सर” सभी एक साथ बोले।
“बस!उसी कमी को हमारे आयुष ने पूरा कर दिया और आज हम इस मुकाम पर पहुँच गए। गुप्ता जी और मैं, कल आयुष के घर गए थे और वो प्रेजेंटेशन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत डील भी फाइनल कर दिया। आई एम प्राउड ऑफ आयुष”
तालियों की गड़गड़ाहट ने आयुष का अभिनंदन किया। वहाँ उपस्थित सभी सदस्यों की प्रशंसा पाकर उसका चेहरा चमक उठा किंतु समीर यह सब देख कुंठा से भर गया। सभी कर्मचारियों ने उसे बधाई दी और ऑफिस में चले गए।

आयुष अभी भी मीटिंग हॉल में ही खड़ा था। “आई एम प्राउड ऑफ आयुष” उसके कानों में ये वाक्य फिर एक बार गूँज उठा और चेहरे पर अभी भी हल्की मुस्कुराहट मौजूद थी। इसी बीच समीर उसके करीब आया।
“कांग्रेचुलेशन मित्तल जी, आपने तो जादू ही कर दिया” समीर ने हाथ बढ़ाते हुए कहा।

“थैंक यू सो मच शर्मा जी। सब कुछ आपके सहयोग से ही हुआ है। मैंने तो बस अपना काम किया है। वैसे मैं आपको जितनी बार भी थैंक यू बोलूँ बहुत कम है।
आप नहीं होते तो पता नहीं कल शांति का क्या होता”

“नही नहीं, ऐसी बात नहीं। आखिर अपने ही तो अपनों के काम आते हैं। अब भाभीजी की तबियत कैसी है? ख्याल रखिए भई उनका”

“जी। शान्ति अब पूरी तरह ठीक है”
बातचीत करते हुए वे अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए।
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दोपहर के एक बज रहे थे घर के कार्यों से फुर्सत होकर शांति सोफे पर बैठी। पास में दीवार पर टंगी उन तीनों की तस्वीर को देख वह मुस्कुराई।
“मैंने तुम्हारी परवरिश पर शक किया था न!आज मैं कहता हूँ तुम एक परफेक्ट मदर हो और…” आयुष द्वारा कही इस बात को वह बार-बार याद करने लगी। जो भी हुआ,जैसे भी हुआ आयुष को इस बात का एहसास तो हुआ कि उसकी ममता ने निखिल को अच्छा रास्ता ही दिखाया है।
आलमारी से एक हरे रंग की साड़ी को उसने निकाला और उसे स्पर्श करने लगी। आज से दो साल पहले जब अपने भाई सुनील की जिद पर वे शॉपिंग मॉल गए थे। निखिल तो बस खेल खिलौनों की दुकान पर अटक गया था। सुनील के बार- बार कहने पर आयुष ने एक यही साड़ी उसके हाथों में थमा दिया और नीचे की ओर देखते हुए धीमे अंदाज में कहा- “सुनील इतनी जिद कर रहा है तो इसे रख लो अब”
जीवन में पहली बार उसके द्वारा दिए हुए इस उपहार को शांति ने ज्यों का त्यों ही रख दिया था। उसके बाद
आयुष ने भी कभी इसका जिक्र नहीं किया।
शांति ने पुनः उसे समेटा और आलमारी में रख दिया। उसके मन में बस एक ही विचार आया, क्या आयुष कभी इस साड़ी के बारे में उसे पूछेगा, बेमन से दिया हुआ ये उपहार क्या आलमारी के किसी कोने में ही पड़ा रह जाएगा।
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निखिल का स्कूल
आयुष अपने दोस्तों के साथ कक्षा के बाहर खड़ा था। सामने से आते हुए कोच सर को देख उसने अपना चेहरा घुमा लिया।
“तो क्या सोचा है निखिल” सर ने उससे पूछा।
“जी सर मै वो”
“मैं जानता हूँ तुम्हारे लिए थोड़ा मुश्किल है लेकिन अपने पापा के बारे में भी तो जरा सोचों” सर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
निखिल कुछ जवाब दे पाता इससे पहले ही सर के कानों में एक आवाज गूँज उठी।
“बिल्कुल सोच लिया है”
सर ने पीछे मुड़कर देखा और आयुष को सामने देख दंग रह गए।
“निखिल ने भी सोंच लिया है और मैने भी। अब इसे क्रिकेट पसंद नहीं तो कोई बात नहीं।किसी दूसरे फील्ड में भी तो अच्छा करके मेरा नाम रोशन कर सकता है न” आयुष ने निखिल को निहारते हुए कहा।

“मित्तल जी, मैं कुछ समझा नहीं। पहले तो आप इसे चैंपियन बनाने की बात करते थे और अब”

आयुष बोला,“सॉरी सर,अब मैंने अपना फैसला बदल लिया है। मैं अपने बेटे को अपने सपनों का बोझ उठाने पर मजबूर नहीं करूंगा”
सर आश्चर्यचकित रह गए किंतु कोई सवाल नहीं कर पाए। आयुष ने बताया कि निखिल के साथ थोड़ा समय व्यतीत करने के उद्देश्य से वो आज सेंटर से जल्दी ही आ गया है। ऑफिस में सूचना देने के पश्चात वे सैर सपाटे के लिए निकल पड़े।
बाइक में पीछे की सीट पर बैठा हुआ निखिल बोला,“पापा हम कहाँ जा रहे हैं? आप पहली बार मुझे ऐसे लेने आए,मैं तो घबरा ही गया था”

“आज मेरी तरफ से एक सरप्राइज़ है चलो तो पहले”
आयुष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
कुछ ही दूरी का सफर तय करने के पश्चात वे एक प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में पहुँचे।
ढलती शाम के साथ ही निखिल के पेट में हलचल शुरू हो गई थी। उसने बाइक से उतरते हुए कहा, “पापा ये रेस्टोरेंट तो बहुत बड़ा है मैंने कुछ दोस्तों से इसका नाम सुना था”
“अच्छा! तो अब कल तुम भी उन्हें बताना इसके बारे में”
“हाँ पापा। काश! मम्मी भी हमारे साथ होती तो वो भी खुश हो जाती”
बाप- बेटे जैसे ही पार्किंग के अंदर गए इतने में ही आयुष के फोन की घंटी बज उठी।

“अभी मम्मी का नाम ही लिया और देखो”
स्क्रीन पर शांति का नाम देखते ही आयुष बोल पड़ा।
“अच्छा! मम्मी का कॉल है” निखिल मुस्कुराया।

जैसे ही आयुष ने फोन अपने कानों पर टिकाया उसके तो होंश ही उड़ गए। वह चौंकते हुए बोला, “लेकिन ये सब अचानक कैसे, हाँ ठीक है मैं तुरंत पहुँचता हूँ निखिल भी मेरे साथ ही है”

आयुष को परेशान देख निखिल का मुँह उतर गया था। उसने धीमे अंदाज ने पूछा, “क्या हुआ पापा! मम्मी ठीक तो है न”
“सॉरी बेटा, यहाँ फिर कभी आएँगे। हमें फौरन घर पहुँचना होगा,चलो जल्दी बैठो”
आयुष ने निखिल का हाथ पकड़ते हुए कहा।
निखिल के मन में जो तरंगे उठीं थी वो एकाएक शांत हो गई। उतरा हुआ मुँह लेकर वह चुपचाप बाइक पर बैठ गया।