शाम के पाँच बज रहे थे। शांति ने सबके लिए दो जोड़ी कपड़े बैग में रखे और स्वयं भी तैयार होकर आयुष का इंतजार करने लगी।
दरवाजे पर दस्तक हुई।आयुष और निखिल अंदर आए।
“सारी तैयारी हो गई न शांति, सात बजे की बस है
हमें जल्दी निकलना होगा”
“जी। मैंने ज्यादा कपड़े तो नहीं रखे हैं बस”
“हाँ ठीक है अब चलो जल्दी से”
आयुष और शांति की जल्दबाजी देख निखिल जोर से बोला, “कोई बताएगा हम जा कहाँ रहे हैं”
दरवाजे पर दस्तक हुई।आयुष और निखिल अंदर आए।
“सारी तैयारी हो गई न शांति, सात बजे की बस है
हमें जल्दी निकलना होगा”
“जी। मैंने ज्यादा कपड़े तो नहीं रखे हैं बस”
“हाँ ठीक है अब चलो जल्दी से”
आयुष और शांति की जल्दबाजी देख निखिल जोर से बोला, “कोई बताएगा हम जा कहाँ रहे हैं”
शांति ने उसे समझाते हुए बताया कि वे जैसीनगर जा रहे हैं उसके नाना ने तुरंत बुलावा भेजा है।
“अभी तो स्कूल की कोई छुट्टी भी नहीं तो अचानक से नाना घर का प्लान क्यों” निखिल ने हैरान होते हुए कहा।
“बेटा! वो सब वहाँ जाकर पता चलेगा” शांति ने इतना कहकर उसका मुँह बंद करा दिया।
“अभी तो स्कूल की कोई छुट्टी भी नहीं तो अचानक से नाना घर का प्लान क्यों” निखिल ने हैरान होते हुए कहा।
“बेटा! वो सब वहाँ जाकर पता चलेगा” शांति ने इतना कहकर उसका मुँह बंद करा दिया।
लगभग तीन घंटे बाद वे जैसीनगर शांति के मायके पहुँचे। एक किराने की दुकान से सटा हुआ पुराना घर जहाँ चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। शांति के छप्पन वर्षीय पिता रघु अग्रवाल चौखट पर क्रोधित खड़े थे। आधे पके हुए बाल और आंखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा टिकाए वे शांति के भाई सुनील को घूर रहे थे। शांति की माँ शोभा अग्रवाल जिसकी उम्र पचास वर्ष थी। उसके चेहरे को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि वो किसी चिंता से ग्रस्त है।
“माँ कैसी हो आप” शांति ने गले लगते हुए कहा।
“बस जी रही हूँ बेटी, क्या बताऊँ इस लड़के ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा। देख आज किस मुकाम पर आ गए हम ” शोभा ने जवाब दिया।
“खुद को संभालिए माँ, हम आ गए हैं न” शांति ने उसे शांत कराते हुए कहा।
आयुष ने अपने सास- ससुर दोनों को प्रणाम किया और निखिल को कुर्सी पर बिठाया। मौजूदा परिस्थितियों को निखिल समझ ही नहीं पा रहा था। साधारण सी पेंट शर्ट, सामान्य कद काठी, गोरा रंग और घूँघराले बाल वाला पच्चीस वर्षीय शांति का भाई सुनील शांत खड़ा था।
“मामा जी! कैसे हो आप, आप हमें बस स्टॉप तक लेने क्यों नहीं आए” निखिल ने सुनील की ओर देखते हुए कहा।
उसके ठीक बगल में बैठी बाईस वर्षीय यामिनी। लाल रंग की साड़ी और सोलह श्रृंगार के साथ वह सुंदरता की मूरत सी प्रतीत हो रही थी। कुछ घबराई हुई, पलकें झुकाई हुई वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी।
“बस जी रही हूँ बेटी, क्या बताऊँ इस लड़के ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा। देख आज किस मुकाम पर आ गए हम ” शोभा ने जवाब दिया।
“खुद को संभालिए माँ, हम आ गए हैं न” शांति ने उसे शांत कराते हुए कहा।
आयुष ने अपने सास- ससुर दोनों को प्रणाम किया और निखिल को कुर्सी पर बिठाया। मौजूदा परिस्थितियों को निखिल समझ ही नहीं पा रहा था। साधारण सी पेंट शर्ट, सामान्य कद काठी, गोरा रंग और घूँघराले बाल वाला पच्चीस वर्षीय शांति का भाई सुनील शांत खड़ा था।
“मामा जी! कैसे हो आप, आप हमें बस स्टॉप तक लेने क्यों नहीं आए” निखिल ने सुनील की ओर देखते हुए कहा।
उसके ठीक बगल में बैठी बाईस वर्षीय यामिनी। लाल रंग की साड़ी और सोलह श्रृंगार के साथ वह सुंदरता की मूरत सी प्रतीत हो रही थी। कुछ घबराई हुई, पलकें झुकाई हुई वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी।
“सुनील ये सब कब हुआ, तुमने माँ-पापा को इस बारे में पहले क्यों नहीं बताया” आयुष ने सुनील से पूछा।
“जीजा जी वो, माँ-पापा तो कभी” सुनील ने घबराते हुए कहा।
“जीजा जी वो, माँ-पापा तो कभी” सुनील ने घबराते हुए कहा।
“किसी को इस बारे में कुछ भनक तक नहीं थी। अगर ये सब पहले पता होगा तो आज ये दिन न देखना पड़ता” रघु ने बरसते हुए कहा।
“क्या- क्या नहीं सोचा था इसके लिए, हमारे तो करम ही फूट गए” शोभा ने सुनील को ताना मारते हुए कहा।
“बस!अब हो भी गया। आप लोग समझ क्यों नहीं रहे। बार- बार वही बात तोते की तरह रट रहे हैं। जीजा जी आप सबसे पहले मेरी बात सुनिए” सुनील ने भी झल्लाते हुए कहा।
आयुष ने निखिल को अंदर कमरे में भेज दिया और रघु से आग्रह किया कि वे सुनील और यामिनी की बात ध्यान से सुनें।
सुनील ने यामिनी का हाथ हाथ थामा और कहा, “मैं यामिनी से कॉलेज के दिनों से ही बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। यामिनी ही मेरा पहला और आखिरी प्यार है। हम दोनों एक दूसरे के बिना जी नहीं सकते।इसके पेरेंट्स बिना बिना मर्जी के ही इसे किसी और के गले में बाँध देना चाहते थे। माँ और पापा तो इस रिश्ते के लिए कभी राजी ही नहीं होते क्योंकि यामिनी तो हमारी बिरादरी की है ही नहीं। इसने अपना सबकुछ मुझपर ही लुटा दिया तो मैं इसे किसी और की कैसे होने देता। इसलिए हमने आज सुबह ही आर्य समाज के मंदिर में शादी की और सीधे घर आ गए”
“बस!अब हो भी गया। आप लोग समझ क्यों नहीं रहे। बार- बार वही बात तोते की तरह रट रहे हैं। जीजा जी आप सबसे पहले मेरी बात सुनिए” सुनील ने भी झल्लाते हुए कहा।
आयुष ने निखिल को अंदर कमरे में भेज दिया और रघु से आग्रह किया कि वे सुनील और यामिनी की बात ध्यान से सुनें।
सुनील ने यामिनी का हाथ हाथ थामा और कहा, “मैं यामिनी से कॉलेज के दिनों से ही बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। यामिनी ही मेरा पहला और आखिरी प्यार है। हम दोनों एक दूसरे के बिना जी नहीं सकते।इसके पेरेंट्स बिना बिना मर्जी के ही इसे किसी और के गले में बाँध देना चाहते थे। माँ और पापा तो इस रिश्ते के लिए कभी राजी ही नहीं होते क्योंकि यामिनी तो हमारी बिरादरी की है ही नहीं। इसने अपना सबकुछ मुझपर ही लुटा दिया तो मैं इसे किसी और की कैसे होने देता। इसलिए हमने आज सुबह ही आर्य समाज के मंदिर में शादी की और सीधे घर आ गए”
“भाई! मैं मानती हूँ प्यार में पड़ा इंसान कुछ समझ नहीं पाता लेकिन एक बार माँ-पापा के बारे में भी सोचा होता। इतना बड़ा फैसला तूने अकेले ही ले लिया” शांति ने भावुक होकर कहा।
“इसने जो भी फैसला लिया हो शांति, लेकिन मैं इन दोनों को इस घर में रहने नहीं दे सकता। ये अपना जुगाड़ कहीं और देख ले” रघु ने भड़कते हुए कहा।
“दामाद जी, आप इसे समझा दीजिएl
ये लड़की यहाँ नहीं रह सकती” शोभा ने भी ऊँची आवाज में कहा।
“माँ, प्लीज आप लोग मेरी सुनिए। जो होना था वो अब हो गया, ये आपका बेटा है और ये आपकी बहु। एक इंसानियत के नाते भी हमारा फर्ज बनता है कि हम इन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकते” आयुष ने शोभा को समझाते हुए कहा।
“दामाद जी, आप इसे समझा दीजिएl
ये लड़की यहाँ नहीं रह सकती” शोभा ने भी ऊँची आवाज में कहा।
“माँ, प्लीज आप लोग मेरी सुनिए। जो होना था वो अब हो गया, ये आपका बेटा है और ये आपकी बहु। एक इंसानियत के नाते भी हमारा फर्ज बनता है कि हम इन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकते” आयुष ने शोभा को समझाते हुए कहा।
“माँ, पापा! ये बिलकुल सही कह रहे हैं। यामिनी का मायका भी छूट गया अब वो कहाँ जाएगी। आखिर सुनील के साथ अब ये भी तो हमारी अपनी हुई न। भाई ने इस पसंद किया है तो हमें भी जात-पात से ऊँचा उठ कर इन्हें एक मौका देना चाहिए” शांति ने भी सुनील का पक्ष लेते हुए कहा।
आयुष और शांति दोनों ने ही बारी-बारी से रघु और शोभा को समझा बुझा कर किसी तरह मनाया।
आयुष और शांति दोनों ने ही बारी-बारी से रघु और शोभा को समझा बुझा कर किसी तरह मनाया।
अगली सुबह
आई सी आई कम्प्यूटर सेंटर में आज काफी हलचल थी। एक्सेल नेट के कोर्स में प्रवेश प्रक्रिया की शरुआत हो चुकी थी। विद्यार्थियों की लम्बी कतार को देख समीर भौक्का रह गया। रिसेप्शन पर बैठी मिस रिया एक के बाद एक आवेदन वाली फाइलों को जमाती हुई एंट्री कर रही थी।आसपास निहारते हुए समीर ने अंदर प्रवेश किया।
“गुड मॉर्निंग रिया,कितने फॉर्म कलेक्ट हो गए”
आई सी आई कम्प्यूटर सेंटर में आज काफी हलचल थी। एक्सेल नेट के कोर्स में प्रवेश प्रक्रिया की शरुआत हो चुकी थी। विद्यार्थियों की लम्बी कतार को देख समीर भौक्का रह गया। रिसेप्शन पर बैठी मिस रिया एक के बाद एक आवेदन वाली फाइलों को जमाती हुई एंट्री कर रही थी।आसपास निहारते हुए समीर ने अंदर प्रवेश किया।
“गुड मॉर्निंग रिया,कितने फॉर्म कलेक्ट हो गए”
“गुड मॉर्निंग सर, मैंने अभी तो स्टार्ट किया है वैसे पूरे सौ फॉर्म हो गए हैं ”
“वेरी गुड, कीप इट अप”
मन ही मन आयुष को तलाश करते हुए वह मिस्टर दुहलानी के केबिन में गया। यहाँ भी उसे मौजूद न पाकर उसके मन में उथल पुथल होने लगी। वह स्वयं को रोक ही न पाया और उनसे आयुष के बारे में पूछ बैठा।
मिस्टर दुहलानी ने उसे बताया कि आयुष दो दिनों के अवकाश पर है।
“ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई कि ये मित्तल छुट्टी पर है। मुझे पता लगाना होगा”
समीर मन ही मन बुदबुदाया और कुछ देर बाद अपने कार्यों में व्यस्त हो गया।
क्रमशः……..
मन ही मन आयुष को तलाश करते हुए वह मिस्टर दुहलानी के केबिन में गया। यहाँ भी उसे मौजूद न पाकर उसके मन में उथल पुथल होने लगी। वह स्वयं को रोक ही न पाया और उनसे आयुष के बारे में पूछ बैठा।
मिस्टर दुहलानी ने उसे बताया कि आयुष दो दिनों के अवकाश पर है।
“ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई कि ये मित्तल छुट्टी पर है। मुझे पता लगाना होगा”
समीर मन ही मन बुदबुदाया और कुछ देर बाद अपने कार्यों में व्यस्त हो गया।
क्रमशः……..
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