विषय- ख़ामोशी की ज़ुबां
कहानी का शिर्षक “अनकही दास्तान”
संध्या का समय था। सूरज ढल चुका था, और हल्की ठंडी हवा माहौल में एक अजीब सी उदासी घोल रही थी। लखनऊ के पुराने इलाके में स्थित "बेगम हवेली", आज भी उसी ठाठ-बाठ के साथ खड़ी थी, मगर उसके अंदर रहने वाली जोया की ज़िंदगी वीरान हो चुकी थी।
जोया, एक खूबसूरत मगर खामोश लड़की। अपने कहानी की नायिका। उसकी आँखों में हज़ारों सवाल थे, मगर होंठ हमेशा चुप रहते। उसकी खामोशी ही उसकी पहचान थी। हवेली में नौकर-चाकर तो थे, मगर कोई उसके मन की बात समझ नहीं पाता।
उसकी ज़िंदगी का एक ही मकसद था – हर शाम हवेली के उस पुराने बाग़ में बैठकर अपनी डायरी में कुछ लिखना। किसी ने कभी नहीं पढ़ा कि वो क्या लिखती है, मगर वो हर रोज़ बिना चूके अपनी भावनाओं को शब्दों में उतारती।
एक दिन हवेली में एक नया मेहमान आया – आफ़ताब मिर्ज़ा। वो एक युवा लेखक था, जो पुरानी हवेलियों और उनसे जुड़ी कहानियों पर रिसर्च कर रहा था। उसे बताया गया था कि बेगम हवेली के इतिहास में कई रहस्य छुपे हैं।
जब आफ़ताब ने पहली बार जोया को देखा, तो वो उसकी खामोश आँखों में खो गया। वो चाहता था कि उससे बातें करे, उसकी खामोशी को समझे, मगर जोया ने उससे नज़रें मिलाने से भी इनकार कर दिया।
आफ़ताब ने हवेली के नौकरों से उसके बारे में पूछा, मगर किसी को ज़्यादा कुछ नहीं पता था। बस एक ही बात सब जानते थे – जोया किसी से भी बात नहीं करती। उसकी दुनिया सिर्फ़ उसकी डायरी तक सीमित थी।
ये बाते सुनकर अफताब ने एक दिन तय किया कि वो जोया को समझने की कोशिश करेगा। उसने हवेली के बाग़ में जाकर लिखना शुरू कर दिया, ताकि जोया को लगे कि वो भी उसकी तरह लेखन से जुड़ा हुआ है। कई दिनों तक वो वहाँ बैठा, मगर जोया ने उसकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया।
एक रात जब सब सो चुके थे, आफ़ताब ने देखा कि जोया छत पर अकेली बैठी आसमान को देख रही थी। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी। चाँदनी रात में उसकी आँखें चमक रही थीं, मगर उसमें एक गहरी उदासी थी। आफ़ताब की हिम्मत नहीं हुई कि वो उससे कुछ कहे, मगर उसने महसूस किया कि जोया की ख़ामोशी के पीछे कोई दर्द छुपा है।
आख़िरकार, एक दिन आफ़ताब ने उसकी डायरी पढ़ने का फैसला किया। उसने सोचा कि शायद इसमें उसकी चुप्पी का राज़ छुपा हो। वो रात को धीरे से बाग़ में गया और वहाँ पड़ी जोया की डायरी उठा ली। उस दिन जोया अपनी डायरी बाग मे भूल गयी थी। ये अफताब ने देखा था।
अफताब जोया जाने के बाद धीरेसे बाग मे आया और ऊसने वो डायरी ऊठायी। जब उसने पहला पन्ना खोला, तो उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं।
"मैं अपनी आवाज़ खो चुकी हूँ... अब मेरी खामोशी ही मेरी ज़ुबान है।"
आफ़ताब ने डायरी के पन्ने पलटने शुरू किए। हर एक पन्ने पर दर्द भरी बातें लिखी थीं –
"किसी ने मेरी दुनिया उजाड़ दी, मगर मैं चीख भी नहीं सकती।"
कहानी का शिर्षक “अनकही दास्तान”
संध्या का समय था। सूरज ढल चुका था, और हल्की ठंडी हवा माहौल में एक अजीब सी उदासी घोल रही थी। लखनऊ के पुराने इलाके में स्थित "बेगम हवेली", आज भी उसी ठाठ-बाठ के साथ खड़ी थी, मगर उसके अंदर रहने वाली जोया की ज़िंदगी वीरान हो चुकी थी।
जोया, एक खूबसूरत मगर खामोश लड़की। अपने कहानी की नायिका। उसकी आँखों में हज़ारों सवाल थे, मगर होंठ हमेशा चुप रहते। उसकी खामोशी ही उसकी पहचान थी। हवेली में नौकर-चाकर तो थे, मगर कोई उसके मन की बात समझ नहीं पाता।
उसकी ज़िंदगी का एक ही मकसद था – हर शाम हवेली के उस पुराने बाग़ में बैठकर अपनी डायरी में कुछ लिखना। किसी ने कभी नहीं पढ़ा कि वो क्या लिखती है, मगर वो हर रोज़ बिना चूके अपनी भावनाओं को शब्दों में उतारती।
एक दिन हवेली में एक नया मेहमान आया – आफ़ताब मिर्ज़ा। वो एक युवा लेखक था, जो पुरानी हवेलियों और उनसे जुड़ी कहानियों पर रिसर्च कर रहा था। उसे बताया गया था कि बेगम हवेली के इतिहास में कई रहस्य छुपे हैं।
जब आफ़ताब ने पहली बार जोया को देखा, तो वो उसकी खामोश आँखों में खो गया। वो चाहता था कि उससे बातें करे, उसकी खामोशी को समझे, मगर जोया ने उससे नज़रें मिलाने से भी इनकार कर दिया।
आफ़ताब ने हवेली के नौकरों से उसके बारे में पूछा, मगर किसी को ज़्यादा कुछ नहीं पता था। बस एक ही बात सब जानते थे – जोया किसी से भी बात नहीं करती। उसकी दुनिया सिर्फ़ उसकी डायरी तक सीमित थी।
ये बाते सुनकर अफताब ने एक दिन तय किया कि वो जोया को समझने की कोशिश करेगा। उसने हवेली के बाग़ में जाकर लिखना शुरू कर दिया, ताकि जोया को लगे कि वो भी उसकी तरह लेखन से जुड़ा हुआ है। कई दिनों तक वो वहाँ बैठा, मगर जोया ने उसकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया।
एक रात जब सब सो चुके थे, आफ़ताब ने देखा कि जोया छत पर अकेली बैठी आसमान को देख रही थी। उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी। चाँदनी रात में उसकी आँखें चमक रही थीं, मगर उसमें एक गहरी उदासी थी। आफ़ताब की हिम्मत नहीं हुई कि वो उससे कुछ कहे, मगर उसने महसूस किया कि जोया की ख़ामोशी के पीछे कोई दर्द छुपा है।
आख़िरकार, एक दिन आफ़ताब ने उसकी डायरी पढ़ने का फैसला किया। उसने सोचा कि शायद इसमें उसकी चुप्पी का राज़ छुपा हो। वो रात को धीरे से बाग़ में गया और वहाँ पड़ी जोया की डायरी उठा ली। उस दिन जोया अपनी डायरी बाग मे भूल गयी थी। ये अफताब ने देखा था।
अफताब जोया जाने के बाद धीरेसे बाग मे आया और ऊसने वो डायरी ऊठायी। जब उसने पहला पन्ना खोला, तो उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं।
"मैं अपनी आवाज़ खो चुकी हूँ... अब मेरी खामोशी ही मेरी ज़ुबान है।"
आफ़ताब ने डायरी के पन्ने पलटने शुरू किए। हर एक पन्ने पर दर्द भरी बातें लिखी थीं –
"किसी ने मेरी दुनिया उजाड़ दी, मगर मैं चीख भी नहीं सकती।"
"किसी ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया, मगर मैं शिकायत भी नहीं कर सकती।"
"मेरा प्यार अधूरा रह गया, मगर मैं अपनी मोहब्बत की दास्ताँ किसी को सुना नहीं सकती।"
आफ़ताब के रोंगटे खड़े हो गए। उसने महसूस किया कि जोया की खामोशी सिर्फ़ उसकी आदत नहीं थी, बल्कि उसके साथ कुछ ऐसा हुआ था जिसने उसकी आवाज़ छीन ली थी।
अफताब अपनी कहानी का नायक। अफ़ताब जिसका अर्थ "सूरज" या "प्रकाश" होता है। अफ़ताब का व्यक्तित्व ऐसाही सकारात्मक है।
अफ़ताब एक गंभीर, संवेदनशील और गूढ़ व्यक्तित्व वाला व्यक्ति है। वह दुनिया को सतही रूप से नहीं, बल्कि गहराई से देखने वाला इंसान है। उसकी आँखों में एक रहस्यमयी चमक है, जो यह दर्शाती है कि वह भावनाओं को सिर्फ समझता ही नहीं, बल्कि उन्हें महसूस भी करता है।
जोया की डायरी पढ़ने का साहस वही कर सकता है, जो दूसरों की भावनाओं को समझने की काबिलियत रखता हो। अफ़ताब न केवल एक अच्छा श्रोता है, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति भी है जो शब्दों के पीछे छिपे दर्द, प्रेम और खोए हुए सपनों को महसूस कर सकता है।
उसका स्वभाव संयमी है—वह जल्दबाज़ी में कोई राय नहीं बनाता। वह धैर्यवान और सहनशील है, किसी भी चीज़ को समझने के लिए उसे पूरा समय देता है। उसका हृदय कोमल है, लेकिन दिमाग़ तेज़—वह भावुक होते हुए भी तार्किक सोच रखता है।
अफ़ताब का व्यक्तित्व एक ऐसे इंसान का है जो जीवन के हर पहलू को गहराई से जीता है। वह भीड़ में अलग दिखता है, क्योंकि उसकी उपस्थिति में एक अजीब-सी शांति और गहराई होती है। वह कोई हड़बड़ी में निर्णय लेने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि हर चीज़ का विश्लेषण करके, उसे आत्मसात करके ही आगे बढ़ता है।
अफ़ताब एक ऐसा व्यक्ति है जो प्रेम और दर्द को बराबर समझता है। जोया की डायरी उसके लिए सिर्फ़ कुछ पन्नों का संग्रह नहीं, बल्कि किसी के जीवन की अनकही कहानी है, जिसे वह पढ़ते हुए महसूस भी करता है और जीता भी है।
******
अगले दिन, आफ़ताब ने जोया से पूछा –
"तुम्हारी डायरी पढ़ी... क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम्हारे साथ क्या हुआ था?"
जोया ने उसकी तरफ़ देखा, मगर कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर होंठ फिर भी चुप थे।
एक दिन आख़िरकार, नौकरानी फिरदौस बाई ने बताया –
"जोया साहिबा की शादी होने वाली थी, मगर एक हादसे में उनके मंगेतर की मौत हो गई। सदमे में जोया की आवाज़ चली गई। डॉक्टरों ने कहा कि शायद सदमे की वजह से उनकी बोलने की शक्ति खत्म हो गई है।"
आफ़ताब का दिल भर आया। उसने तय किया कि वो जोया को फिर से बोलने के लिए प्रेरित करेगा। वो हर दिन उसके पास बैठकर कहानियाँ सुनाता, उसे मुस्कुराने की कोशिश करता, मगर जोया हमेशा चुप रहती।
एक दिन आफ़ताब ने जोया के सामने एक कागज़ रखा, जिस पर सिर्फ़ एक सवाल लिखा था –
"अगर तुम्हें कोई दर्द है, तो क्या तुम इसे शब्दों में बयां कर सकती हो?"
जोया ने कागज़ उठाया और काँपते हाथों से लिखा –
"खामोशी भी चीखती है, मगर सुनने वाला चाहिए।"
उस दिन आफ़ताब को अहसास हुआ कि कुछ कहानियाँ शब्दों से नहीं, बल्कि खामोशी से लिखी जाती हैं। उसने जोया से वादा किया कि वो उसकी अधूरी कहानी को अपनी किताब में पूरा करेगा।
धीरे-धीरे, जोया की खामोशी की जुबां बनने वाला आफ़ताब, उसकी दुनिया का हिस्सा बन गया।
कभी-कभी, मोहब्बत आवाज़ से नहीं, खामोशी से भी महसूस होती है।
आफ़ताब को अब इस खामोश लड़की की ज़ुबां बनना था। मगर कैसे? वो समझ चुका था कि जोया के साथ ज़बरदस्ती करने से कुछ नहीं होगा। उसे जोया के दिल तक पहुँचना था, उसकी भावनाओं को धीरे-धीरे शब्दों में ढालना था।
आफ़ताब और जोया के बीच बात करने का एक अनोखा तरीका बन गया। आफ़ताब बोलता, और जोया उसे जवाब लिखकर देती। कई बार वो सिर्फ़ अपनी आँखों से जवाब देती, और कभी-कभी हल्की सी मुस्कान में छुपा लेती।
आफ़ताब ने मुस्कुराते हुए कहाँ,
"क्या तुम जानती हो कि तुम्हारी खामोशी में भी एक संगीत है?"
जोया ने कागज़ पर लिखा
"अगर खामोशी संगीत होती, तो शायद मैं सबसे दर्दनाक धुन होती।"
आफ़ताब को समझ आ गया कि जोया सिर्फ़ चुप नहीं थी, बल्कि उसकी खामोशी एक चीख थी, जो उसने खुद दबा रखी थी।
आफ़ताब जानता था कि डॉक्टरों ने कह दिया था कि सदमे की वजह से जोया की आवाज़ चली गई थी। मगर वो यह भी जानता था कि यह एक मानसिक रुकावट थी। जोया बोल सकती थी, मगर उसका दिल बोलने की इजाज़त नहीं दे रहा था। आफ़ताब को उसका भरोसा जीतना था, और उसे फिर से अपनी आवाज़ पर यक़ीन दिलाना था।
आफ़ताब ने हवेली में एक कोना ऐसा बना दिया, जहाँ जोया की पुरानी यादों की जगह नई यादें जुड़ें। उसने वहाँ कागज़ और ब्रश रख दिए, ताकि जोया लिखने के बजाय पेंटिंग करने लगे। जब भी जोया कुछ महसूस करती, वो उसे रंगों में ढालती।
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एक दिन आफ़ताब ने हवेली में पुरानी ग़ज़लें बजानी शुरू कर दीं। जोया को पहले इसमें दिलचस्पी नहीं थी, मगर धीरे-धीरे वो ग़ज़लों के बोलों को समझने लगी। आफ़ताब जानता था कि शब्दों का असर गहरा होता है। उसने जोया के लिए कुछ ग़ज़लें भी लिखीं और उन्हें खुद गुनगुनाया।
एक दिन जब आफ़ताब एक दर्द भरी नज़्म गुनगुना रहा था, तो जोया की आँखों में आँसू आ गए। उसके होंठ कुछ कहने के लिए हिले, मगर कोई आवाज़ नहीं निकली। मगर वो पहला इशारा था कि उसकी आवाज़ लौट सकती थी।
एक दिन जब आफ़ताब एक दर्द भरी नज़्म गुनगुना रहा था, तो जोया की आँखों में आँसू आ गए। उसके होंठ कुछ कहने के लिए हिले, मगर कोई आवाज़ नहीं निकली। मगर वो पहला इशारा था कि उसकी आवाज़ लौट सकती थी।
आफ़ताब को पता चला कि जोया की आवाज़ जाने की असली वजह सिर्फ़ सदमा नहीं था, बल्कि डर था। उसके मंगेतर की मौत ने उसे इतना तोड़ दिया था कि उसने ख़ुद को ही सज़ा दे दी। आफ़ताब ने उसे समझाया –
"अगर तुम्हारी आवाज़ तुम्हारी पहचान थी, तो तुम इसे खोने क्यों दे रही हो? तुम्हारी कहानी अधूरी नहीं रहनी चाहिए।"
एक दिन आफ़ताब ने जोया को एक ज़रूरी सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर किया।
"क्या तुम अब भी अपने मंगेतर से प्यार करती हो?"
जोया का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों में तूफ़ान था। उसके होंठ काँपे, और पहली बार...
उसने एक शब्द बोला – "हाँ।"
आफ़ताब की आँखों में चमक आ गई। वो जान गया कि यह पहला कदम था।
****
आफ़ताब ने जोया के लिए एक खास चिट्ठी लिखी और उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए कहा।
"अगर तुम इसे पढ़कर सुना सको, तो इसका मतलब है कि तुम अपनी खामोशी से आज़ाद हो चुकी हो।"
जोया काँपते हाथों से चिट्ठी उठाती है। वो कोशिश करती है। आवाज़ नहीं निकलती। आफ़ताब उसे देखता रहता है।
फिर अचानक, वो आँखे बंद करती है, गहरी साँस लेती है और धीमे-धीमे शब्द निकलते हैं –
"ख़ामोशी की भी एक जुबां होती है, मगर अब मुझे बोलना है।"
आफ़ताब की आँखों में आँसू आ गए। जोया ने जीत हासिल कर ली थी।
उस दिन के बाद, जोया ने धीरे-धीरे बोलना शुरू कर दिया। और आफ़ताब? वो उसकी आवाज़ की सबसे पहली कहानी बन गया।
—-----------
जब अफताब हवेली मे आया था तब हवेली की हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था। आफ़ताब ने जोया की खामोशी को महसूस किया था, उसकी उदासी को पढ़ा था, और धीरे-धीरे, बिना जाने ही, उसकी आँखों में अपना अक्स देखने लगा था। मगर वो जानता था कि जोया अब भी अपने अतीत से बंधी थी, अपने मंगेतर की यादों में उलझी थी।
वो जोया से प्यार करने लगा था, मगर उसकी मोहब्बत में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं थी। वो चाहता था कि अगर जोया उसके करीब आए, तो अपने दिल से, अपनी मर्ज़ी से ।
"अगर तुम्हारी आवाज़ तुम्हारी पहचान थी, तो तुम इसे खोने क्यों दे रही हो? तुम्हारी कहानी अधूरी नहीं रहनी चाहिए।"
एक दिन आफ़ताब ने जोया को एक ज़रूरी सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर किया।
"क्या तुम अब भी अपने मंगेतर से प्यार करती हो?"
जोया का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों में तूफ़ान था। उसके होंठ काँपे, और पहली बार...
उसने एक शब्द बोला – "हाँ।"
आफ़ताब की आँखों में चमक आ गई। वो जान गया कि यह पहला कदम था।
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आफ़ताब ने जोया के लिए एक खास चिट्ठी लिखी और उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए कहा।
"अगर तुम इसे पढ़कर सुना सको, तो इसका मतलब है कि तुम अपनी खामोशी से आज़ाद हो चुकी हो।"
जोया काँपते हाथों से चिट्ठी उठाती है। वो कोशिश करती है। आवाज़ नहीं निकलती। आफ़ताब उसे देखता रहता है।
फिर अचानक, वो आँखे बंद करती है, गहरी साँस लेती है और धीमे-धीमे शब्द निकलते हैं –
"ख़ामोशी की भी एक जुबां होती है, मगर अब मुझे बोलना है।"
आफ़ताब की आँखों में आँसू आ गए। जोया ने जीत हासिल कर ली थी।
उस दिन के बाद, जोया ने धीरे-धीरे बोलना शुरू कर दिया। और आफ़ताब? वो उसकी आवाज़ की सबसे पहली कहानी बन गया।
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जब अफताब हवेली मे आया था तब हवेली की हवा में एक अजीब सा सन्नाटा था। आफ़ताब ने जोया की खामोशी को महसूस किया था, उसकी उदासी को पढ़ा था, और धीरे-धीरे, बिना जाने ही, उसकी आँखों में अपना अक्स देखने लगा था। मगर वो जानता था कि जोया अब भी अपने अतीत से बंधी थी, अपने मंगेतर की यादों में उलझी थी।
वो जोया से प्यार करने लगा था, मगर उसकी मोहब्बत में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं थी। वो चाहता था कि अगर जोया उसके करीब आए, तो अपने दिल से, अपनी मर्ज़ी से ।
****
एक शाम, जब आफ़ताब ने अपने दिल की बात कहनी चाही…
बाग़ के उसी पुराने पेड़ के नीचे, जहाँ कभी जोया अपनी डायरी लेकर बैठती थी, आज आफ़ताब भी चुपचाप बैठा था। उसके हाथ में एक पुरानी किताब थी, मगर नज़रें जोया पर टिकी थीं, जो सामने वाली बेंच पर बैठी थी।
आफ़ताब धीमे स्वर में पूछता है
"जोया, कभी सोचा है कि मोहब्बत दोबारा भी हो सकती है?"
जोया ने उसकी ओर देखा, मगर कोई जवाब नहीं दिया। उसके हाथों में उसकी वही पुरानी डायरी थी। आफ़ताब समझ गया कि वो सवाल से बच रही थी।
आफ़ताब ने मुस्कुराते हुए कहाँ,
"कभी-कभी, कोई किसी के ज़ख्मों को भरने नहीं आता, सिर्फ़ ये बताने आता है कि ज़ख्मों के साथ भी ज़िंदगी जी जा सकती है।"
जोया ने पहली बार आँखें उठाकर उसे देखा। उसकी नज़रों में एक हल्का सा कंपन था, जैसे वो कुछ कहना चाहती हो। मगर फिर उसने निगाहें झुका लीं।
अचानक, जोया ने डायरी के पन्ने पलटे और एक पन्ने पर उँगलियाँ फिराने लगी। फिर, पहली बार, उसने अपनी आवाज़ में कुछ बोलने की कोशिश की—
"ये ग़ज़ल है... उसकी याद में... जो मुझसे दूर चला गया।"
आफ़ताब चुपचाप सुनने लगा। जोया की आवाज़ अब भी हल्की थी, मगर उसकी बातों में गहराई थी। उसने आँखें बंद कीं और पढ़ना शुरू किया—
"तेरी यादों की बारिश में भीगते-भीगते,
मैं खुद को कबका भुला चुकी हूँ।
तेरे जाने के बाद भी मेरे दिल के आँगन में
तेरी आवाज़ अब भी गूंजती है।
"मैंने सोचा था, मोहब्बत रुक जाएगी,
पर ये धड़कनें अब भी तेरा नाम लेती हैं।
जो अधूरा था, वो अधूरा ही रहा,
बस एक साया है, जो मेरे साथ रहता है।"
जोया की आवाज़ काँप रही थी। उसकी आँखों में नमी थी, मगर उसने अपने मंगेतर की यादों को शब्दों में समेटा था।
आफ़ताब ने ग़ज़ल सुनी। हर एक लफ्ज़ उसके दिल पर गिरते हुए बूँदों की तरह लगा। वो मुस्कुराया, मगर उसकी आँखों में एक गहरी उदासी थी।
जोया को अपने मनकी बात बताये बिना चुपचाप लौट जाने का आफ़ताब ने फ़ैसला किया ।जोया ने जब अपनी ग़ज़ल पूरी की, तो आफ़ताब ने गहरी साँस ली और उसके पास जाकर खड़ा हो गया।
आफ़ताब धीमे स्वर में, पर मुस्कुराते हुए बोला,
"तुम्हारी मोहब्बत बहुत खूबसूरत है, जोया। मुझे खुशी है कि तुमने अपनी आवाज़ वापस पाई, भले ही वो किसी और के लिए थी।"
जोया ने चौंककर उसकी ओर देखा। उसे पहली बार एहसास हुआ कि आफ़ताब की आँखों में कुछ बदला-बदला सा था।
जोया के मूहँ से धिरे से निकाला,
"आफ़ताब...?"
आफ़ताब हल्की हँसी के साथ बोला,
"अब मुझे चलना चाहिए, जोया। मैं यहाँ इस पुरानी हवेली के बारे मे संशोधन करने के लिए आया था, लेकिन इस हवेली ने मुझे कुछ और ही काम सौंप दिया ताकि तुम्हें तुम्हारी आवाज़ वापस दिला सकूँ। अब जब वो लौट आई है, तो मेरा यहाँ रुकना ज़रूरी नहीं।"
जोया के हाथ से डायरी गिर गई। पहली बार उसे अहसास हुआ कि आफ़ताब उसके लिए क्या मायने रखता था। मगर शायद अब बहुत देर हो चुकी थी।
आफ़ताब जाने के लिए मुड़ा। उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
जोया की आवाज़ धिमी थी।
“शुक्रिया, आफ़ताब!”
जैसे ही आफ़ताब हवेली से बाहर जाने लगा, जोया के दिल में कुछ टूटा। उसने पहली बार उस एहसास को महसूस किया, जो अब तक उसके दिल में दबी थी।
उसके होंठ काँपे, और पहली बार, बिना किसी झिझक के, उसके मुँह से निकला—
" आफ़ताब!"
आफ़ताब रुक गया। उसने पलटकर देखा। जोया की आँखों में पहली बार नज़दीकियों की एक लौ थी।
मगर आफ़ताब सिर्फ़ मुस्कुराया।
"ख़ामोशी की ज़ुबां को लफ्ज़ देने आया था, अपनी मोहब्बत की फरियाद करने नहीं..."
इतना कहकर, वो हवेली के दरवाज़े से बाहर निकल गया।
और उस दिन, जोया की आवाज़ तो लौट आई, मगर आफ़ताब हमेशा के लिए उसकी ज़िंदगी से चला गया।
जोया की ये कहानी भी अधुरी और अनकही रह गयी। जोया अपने आसूं रोक नहीं पायी। जोया को दूरसे फिरदोस देख रही थी। ऊसे भी दुख हुआ जोया और अफताब की अधुरी कहानी देखकर।
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एक शाम, जब आफ़ताब ने अपने दिल की बात कहनी चाही…
बाग़ के उसी पुराने पेड़ के नीचे, जहाँ कभी जोया अपनी डायरी लेकर बैठती थी, आज आफ़ताब भी चुपचाप बैठा था। उसके हाथ में एक पुरानी किताब थी, मगर नज़रें जोया पर टिकी थीं, जो सामने वाली बेंच पर बैठी थी।
आफ़ताब धीमे स्वर में पूछता है
"जोया, कभी सोचा है कि मोहब्बत दोबारा भी हो सकती है?"
जोया ने उसकी ओर देखा, मगर कोई जवाब नहीं दिया। उसके हाथों में उसकी वही पुरानी डायरी थी। आफ़ताब समझ गया कि वो सवाल से बच रही थी।
आफ़ताब ने मुस्कुराते हुए कहाँ,
"कभी-कभी, कोई किसी के ज़ख्मों को भरने नहीं आता, सिर्फ़ ये बताने आता है कि ज़ख्मों के साथ भी ज़िंदगी जी जा सकती है।"
जोया ने पहली बार आँखें उठाकर उसे देखा। उसकी नज़रों में एक हल्का सा कंपन था, जैसे वो कुछ कहना चाहती हो। मगर फिर उसने निगाहें झुका लीं।
अचानक, जोया ने डायरी के पन्ने पलटे और एक पन्ने पर उँगलियाँ फिराने लगी। फिर, पहली बार, उसने अपनी आवाज़ में कुछ बोलने की कोशिश की—
"ये ग़ज़ल है... उसकी याद में... जो मुझसे दूर चला गया।"
आफ़ताब चुपचाप सुनने लगा। जोया की आवाज़ अब भी हल्की थी, मगर उसकी बातों में गहराई थी। उसने आँखें बंद कीं और पढ़ना शुरू किया—
"तेरी यादों की बारिश में भीगते-भीगते,
मैं खुद को कबका भुला चुकी हूँ।
तेरे जाने के बाद भी मेरे दिल के आँगन में
तेरी आवाज़ अब भी गूंजती है।
"मैंने सोचा था, मोहब्बत रुक जाएगी,
पर ये धड़कनें अब भी तेरा नाम लेती हैं।
जो अधूरा था, वो अधूरा ही रहा,
बस एक साया है, जो मेरे साथ रहता है।"
जोया की आवाज़ काँप रही थी। उसकी आँखों में नमी थी, मगर उसने अपने मंगेतर की यादों को शब्दों में समेटा था।
आफ़ताब ने ग़ज़ल सुनी। हर एक लफ्ज़ उसके दिल पर गिरते हुए बूँदों की तरह लगा। वो मुस्कुराया, मगर उसकी आँखों में एक गहरी उदासी थी।
जोया को अपने मनकी बात बताये बिना चुपचाप लौट जाने का आफ़ताब ने फ़ैसला किया ।जोया ने जब अपनी ग़ज़ल पूरी की, तो आफ़ताब ने गहरी साँस ली और उसके पास जाकर खड़ा हो गया।
आफ़ताब धीमे स्वर में, पर मुस्कुराते हुए बोला,
"तुम्हारी मोहब्बत बहुत खूबसूरत है, जोया। मुझे खुशी है कि तुमने अपनी आवाज़ वापस पाई, भले ही वो किसी और के लिए थी।"
जोया ने चौंककर उसकी ओर देखा। उसे पहली बार एहसास हुआ कि आफ़ताब की आँखों में कुछ बदला-बदला सा था।
जोया के मूहँ से धिरे से निकाला,
"आफ़ताब...?"
आफ़ताब हल्की हँसी के साथ बोला,
"अब मुझे चलना चाहिए, जोया। मैं यहाँ इस पुरानी हवेली के बारे मे संशोधन करने के लिए आया था, लेकिन इस हवेली ने मुझे कुछ और ही काम सौंप दिया ताकि तुम्हें तुम्हारी आवाज़ वापस दिला सकूँ। अब जब वो लौट आई है, तो मेरा यहाँ रुकना ज़रूरी नहीं।"
जोया के हाथ से डायरी गिर गई। पहली बार उसे अहसास हुआ कि आफ़ताब उसके लिए क्या मायने रखता था। मगर शायद अब बहुत देर हो चुकी थी।
आफ़ताब जाने के लिए मुड़ा। उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
जोया की आवाज़ धिमी थी।
“शुक्रिया, आफ़ताब!”
जैसे ही आफ़ताब हवेली से बाहर जाने लगा, जोया के दिल में कुछ टूटा। उसने पहली बार उस एहसास को महसूस किया, जो अब तक उसके दिल में दबी थी।
उसके होंठ काँपे, और पहली बार, बिना किसी झिझक के, उसके मुँह से निकला—
" आफ़ताब!"
आफ़ताब रुक गया। उसने पलटकर देखा। जोया की आँखों में पहली बार नज़दीकियों की एक लौ थी।
मगर आफ़ताब सिर्फ़ मुस्कुराया।
"ख़ामोशी की ज़ुबां को लफ्ज़ देने आया था, अपनी मोहब्बत की फरियाद करने नहीं..."
इतना कहकर, वो हवेली के दरवाज़े से बाहर निकल गया।
और उस दिन, जोया की आवाज़ तो लौट आई, मगर आफ़ताब हमेशा के लिए उसकी ज़िंदगी से चला गया।
जोया की ये कहानी भी अधुरी और अनकही रह गयी। जोया अपने आसूं रोक नहीं पायी। जोया को दूरसे फिरदोस देख रही थी। ऊसे भी दुख हुआ जोया और अफताब की अधुरी कहानी देखकर।
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